सोमवार, 4 जनवरी 2010

क्या तुम किसी हिन्दुस्तानी औरत को जानते हो?


क्या तुम किसी हिन्दुस्तानी औरत को जानते हो?

उसमें बरसात के बाद की
सौधीं मिट्टी की महक है
आश्व्स्त हो जाओगे
उसकी सासों की लय से
पाओगे उसकी बाहों के दायरे में एक सुकून एक सुरक्षा



वह उस् पेड़ की तरह है, जिसके
आस पास जमीन सूखी पथरीली
पेड़ फिर भी हरा-भरा
जड़ें जरूर गहरी है



पास गिरे किसी पत्ते को उठाकर देखो
उसकी धमनियों में तुम
खुद को खून की तरह बहता पाओगे



वह हवा की तरह है
कभी धीमी कभी तेज
वक्त से बेपरवाह
यह हवा तुम्हें
उछाल भी सकती है
ठीक उस तरफ
जिधर तुम्हें जाना है,


किसी धधकती भट्ठी के पास बैठकर
आँच से आते
पसीने को यातना को
महसूस करो
उसे देखो
हमेशा वहीं बैठा पाओगे

लगता है पहाड़ हो गयी हो,


वह असमर्थताओं से नहीं
संभावनाओं से घिरी है
वह पहाड़ में दरवाजे बना सकती है
और हर दरवाजे से
पूरा का पूरा पहाड़ गुजार सकती है



 क्या तुम सचमुच उसे पहचानते हो?
क्या तुम किसी हिन्दुस्तानी औरत को जानते हो?

- बालकृष्ण अय्यर
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