शनिवार, 9 जनवरी 2010

दौर्

          दौर
अनिर्णित से शुरू होती है हर सुबह, और
हर शाम अनिर्णित में डूब जाती है
हर रोज शुरू होता है
एक नया खिंचाव
टूटने से ठीक पहले तक
शिराओं में,
ठीक वहीं
बहते खून की सनसनाहट के नीचे
एक जंगल है
बियाबान, यहाँ
रोज कुछ ज्यादा अकेला होते जाने के
इस दौर में
जी रहे हैं,
हम
पुरानी बातों, पुरानी चीजों और
पुराने लोगों को याद करते हुये.


-बालकृष्ण अय्यर
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