बुधवार, 9 दिसंबर 2009

बस्तर में........

इंद्रावती का चौड़ा पाट
उँचाई से तीली सी दिखती
मछुआरे की नाव
गूंगा आदमी आखों और अंगुलियों से,
जितना कह पाता है
बस उतनी है नांव है
बाकी अनकहा

चित्रकूट प्रपात का शोर
कोने में एक पतली धार की अलग मध्दम आवाज
बहरा आदमी सुन पाता है
बस धार जितना
बाकी अनसुना

कुटुम्बसर गुफा के भीतर, कुछ नहीं दिखता
अंधी मछलियों की तरह
स्पर्श और कल्पना गुत्थम-गुत्था है,
अंधा आदमी देखता है
बस स्पर्श जितना
बाकी अनदेखा

जीवन का 
अनकहा, अनसुना,अनदेखा समय जोड़ा तो पाया
अब तक दिन कुछ ऐसे ही बीते हैं
                                                                           - बालकृष्ण अय्यर्
एक टिप्पणी भेजें